नरेंद्र मोदी की अनसुनी कहानीः कैसे बीजेपी के हर दिग्गज का तख़्तापलट करके वो पीएम बने

1 अक्टूबर 2001. नरेंद्र मोदी किसी टीवी पत्रकार के दाह संस्कार में हिस्सा ले रहे थे. ठीक उसी समय उनके पास प्रधानमंत्री कार्यालय से फोन आया. दूसरी तरफ अटल बिहारी वाजपेयी थे. उन्होंने मोदी को शाम को आकर उनसे मिलने का फरमान सुनाया. शाम को तय समय पर मोदी उनसे मिलने पहुंचे. इस मुलाकात में उन्होंने नरेंद्र मोदी से कहा-
“दिल्ली में पंजाबी खाना खाकर तुम काफी मोटे हो गए हो. फिर से गुजरात लौट जाओ.”
नरेंद्र मोदी को उस समय तक पता नहीं था कि उनका नाम गुजरात के अगले मुख्यमंत्री के तौर पर तय कर दिया गया है. ऐसे में उन्होंने वाजपेयी से पूछा कि वहां जाकर क्या करना है? तब वाजपेयी ने उन्हें बताया कि उन्हें सूबे के मुख्यमंत्री के तौर पर वहां भेजा जा रहा है. एमवी कामत ने 2009 में “Narendra Modi–The Architect of a Modern State” नाम से नरेंद्र मोदी की जीवनी लिखी है. इस जीवनी के मुताबिक नरेंद्र मोदी ने शुरुआत में मुख्यमंत्री पद लेने से यह कहते हुए मना कर दिया था कि वो छह साल से गुजरात से बाहर हैं और उनकी दिलचस्पी मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बैठने के बजाय संगठन के काम करने की है.
जीवनी अक्सर एक तरफा पहलू बयान करने वाले दस्तावेज़ होते हैं. कहानी का एक और पहलू भी है. दिल्ली में रहने के दौरान नरेंद्र मोदी संघ और बीजेपी के राष्ट्रीय नेतृत्व के संपर्क में आए. इस दौरान शंकर सिंह वाघेला एक बार फिर से बीजेपी से विद्रोह कर चुके थे. मोदी दिल्ली में संघ के नेताओं के सामने यह साबित करने में लगे हुए थे कि शंकर सिंह वाघेला के बारे में उनका अंदेशा कितना सटीक साबित हुआ. इस बीच उन्होंने मीडिया में भी अपनी पैठ बनाना शुरू कर दिया और समाचार चैनलों पर उन्हें बीजेपी का पक्ष रखते हुए देखा जा सकता था. 1998 में केशुभाई की सरकार बनने के कुछ समय बाद ही मोदी ने उनके खिलाफ लॉबिंग तेज़ कर दी. 2001 में भुज भूकंप के बाद मोदी को दिल्ली के कई अखबारों और पत्रिकाओं के दफ्तर में केशुभाई सरकार के खिलाफ दस्तावेज़ उपलब्ध करवाते हुए देखा गया. दी कारवां मैगजीन को दिए इंटरव्यू में आउटलुक पत्रिका के संपादक रह चुके विनोद मेहता याद करते हैं-
“जब नरेंद्र मोदी दिल्ली में बीजेपी के लिए काम कर रहे थे वो एक दिन मेरे से मिलने मेरे दफ्तर आए. उनके पास कुछ ऐसे दस्तावेज़ थे जो गुजरात की केशुभाई की सरकार के खिलाफ जाते थे. इसके कुछ दिन बाद मैंने सुना कि उन्हें गुजरात का नया मुख्यमंत्री बनाया जा रहा है.”

गुजरात में केशुभाई पटेल सूखे और भूकंप के साथ-साथ दो उप चुनाव और पंचायती चुनाव में पार्टी की हार की वजह से पार्टी और प्रशासन दोनों मोर्चे पर घिरे हुए थे. नरेंद्र मोदी इस दौरान लगातार दिल्ली में बैठकर संघ और बीजेपी के शीर्ष नेतृत्व के दिमाग यह बात बैठा रहे थे कि केशुभाई के नेतृत्व में 2003 का चुनाव नहीं जीता जा सकता. अंत में सितंबर 2001 में यह तय हो गया कि केशुभाई की विदाई का समय करीब है. नरेंद्र मोदी 1995 में गुजरात बीजेपी और संघ के नेताओं की नाराजगी के चलते सूबे से बाहर किए गए थे. वो जानते थे कि गुजरात बीजेपी का विधायक दल उन्हें अपना नेता कभी नहीं चुनेगा. यह एक सोची-समझी रणनीति थी कि उनका नाम दिल्ली से प्रस्तावित हो. आखिरकार उनकी कोशिश रंग लाई और झंडेवालान के संघ कार्यालय ने उनके नाम पर आखिरी मोहर लगा दी. वो संघ के पहले पूर्णकालिक प्रचारक थे जिन्हें मुख्यमंत्री की कुर्सी सौंपी जा रही थी. ऐसे में उनकी सेफ लैंडिंग के लिए संघ ने बीजेपी के तीन बड़े नेताओं को नियुक्त किया. ये तीन नेता थे, मदन लाल खुराना, कुशाभाऊ ठाकरे और जना कृष्णमूर्ति.
इधर केशुभाई को जब गद्दी खाली करने का फरमान सुनाया गया तो वो ऐसा न करने पर अड़ गए. पहले उन्होंने अपने छह विधायकों को दिल्ली भेजा ताकि वो दिल्ली में यह माहौल बना सकें कि प्रदेश बीजेपी में सभी नेता केशुबापा के हटाए जाने के विरोध में हैं. इन छह विधायकों ने संघ के फरमान के चलते दिल्ली आकर अपनी वफादारी बदल ली. इस धोखे से आहत केशुभाई पटेल ने राजनीति से संन्यास की घोषणा कर दी. 5 अक्टूबर के रोज मदन लाल खुराना नरेंद्र मोदी के साथ ख़ास तौर पर अहमदाबाद आए ताकि इस तख्तापलट को अंजाम दिया जा सके.
खुराना अाखिरकार केशुभाई को मनाने में कामयाब रहे. 6 अक्टूबर को केशुभाई पटेल ने अपना इस्तीफ़ा राज्यपाल को सौंप दिया. इस दिन शाम को ही बीजेपी विधायक दल की मीटिंग बुलाई गई. इस मीटिंग में नरेंद्र मोदी को मुख्यमंत्री चुने जाने का प्रस्ताव केशुभाई के हाथों पेश करवाया गया. सब काम शांति से निपट गया. 7 अक्टूबर के रोज नरेंद्र मोदी ने गुजरात के 14वें मुख्यमंत्री के तौर पर शपथ ली.
हिंदू ह्रदय सम्राट
2003 में राजस्थान में विधानसभा चुनाव थे. गुजरात से सटे राजस्थान के जिले उदयपुर में नरेंद्र मोदी चुनाव प्रचार के लिए आए. मंच पर उनके बगलगीर थीं वसुंधरा राजे सिंधिया. हालांकि उस समय तक बीजेपी का केन्द्रीय नेतृत्व उन्हें विधानसभा चुनाव के प्रचार अभियान से दूर रखे हुए था. जैसे ही वो मंच बोलने के लिए खड़े हुए नीचे खड़ी जनता की तरफ से नारा लगना शुरू हुआ-
“देखो-देखो कौन आया, गुजरात का शेर आया.”
अगले दिन के अखबार इसी नारे को हेडलाइन के तौर पर अपने पहले पन्ने पर टांगे हुए थे. यह राजस्थान में उनकी एकमात्र रैली थी लेकिन इसने बीजेपी को ठीक-ठाक चुनावी फायदा पहुंचा दिया.
गुजरात का शेर, हिन्दू ह्रदय सम्राट ये वो शब्द थे जो राम मंदिर आंदोलन के समय लालकृष्ण आडवाणी के लिए इस्तेमाल होते थे. एक दशक बाद इस संबोधन का पर्याय बदल गया. वजह थी गुजरात दंगा. फरवरी 2002 में गोधरा में साबरमती एक्सप्रेस से अयोध्या से लौट रहे कार सेवकों को जिंदा जलाए जाने के बाद पूरा गुजरात दंगों की आग में झुलस गया. सरकारी आंकड़ों के मुताबिक इन दंगों में मारे गए लोगों की संख्या 1044 है, जबकि स्वतंत्र जांच आयोग की रिपोर्ट्स के मुताबिक यह आंकड़ा 2000 से 2500 के बीच है. गुजरात दंगों में नरेंद्र मोदी की क्या भूमिका थी यह बहस का विषय है. गोधरा के बाद एक बात तयशुदा तौर पर कही जा सकती है कि इन दंगों के बाद मोदी संघ और हिन्दुत्ववादी संगठनों की आंखों का तारा बन गए थे. इसके सबूत हमें मिलते हैं अप्रैल 2002 में हुई बीजेपी कार्यकारिणी मीटिंग में.
वाजपेयी तख्तापलट के शिकार हुए
4 अप्रैल 2002. गुजरात दंगों के एक महीने बाद तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी गुजरात के दौरे पर थे. एक राहत शिविर में वो दंगा प्रभावित लोगों को संबोधित कर रहे थे-
“विदेशों में हिन्दुस्तान की बहुत इज्ज़त है. उनमें मुस्लिम देश भी शामिल हैं. मगर जाने से पहले मैं सोच रहा हूं मैं कौन सा चेहरा लेकर जाऊंगा. कौन सा मुंह लेकर जाऊंगा.”
दिनभर का दौरा खत्म करने के बाद प्रधानमंत्री शाम को अहमदाबाद में पत्रकारों से मुखातिब थे. उनके बगलगीर थे गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी. जब पत्रकारों ने उनसे पूछा कि उनका मुख्यमंत्री के लिए क्या संदेश है. उस समय वायपेयी का जो जवाब था वो आज भी गुजरात दंगों के संदर्भ में नरेंद्र मोदी की सबसे बड़ी आलोचना के तौर पर इस्तेमाल किया जाता है. अटल बिहारी बोले-
“चीफ मिनिस्टर के लिए मेरा एक ही संदेश है कि वो राजधर्म का पालन करें. राजधर्म, यह शब्द काफी सार्थक है. मैं उसी का पालन कर रहा हूं. पालन करने का प्रयास कर रहा हूं. राजा के लिए, शासक के लिए, प्रजा-प्रजा में भेद नहीं हो सकता. न जन्म के आधार पर, न जाति के आधार पर, न संप्रदाय के आधार पर.”
नरेंद्र मोदी पूरी प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान काफी असहज दिख रहे थे. जब वाजपेयी राजधर्म शब्द को ‘सार्थक’ बता रहे थे, नरेंद्र मोदी के चेहरे की एक कड़वी मुस्कान कैमरे में दर्ज कर ली गई. अाखिरकार वो वाजपेयी की नसीहत से उकता से गए. उन्होंने प्रधानमंत्री की बात को बीच में काटते हुए कहा, “हम भी वही कर रहे हैं, साहब.” वाजपेयी समझ गए कि इसके बाद स्थिति अनियंत्रित हो सकती है. बिना मोदी की तरफ देखे उन्होंने अपनी बात जारी रखते हुए कहा, “मुझे विश्वास है कि नरेंद्र भाई यही कर रहे हैं.” इसके बाद उन्होंने ‘बहुत-बहुत धन्यवाद’ कहते हुए प्रेस कॉन्फ्रेस खत्म कर दी.
अटल बिहारी वाजपेयी की बात को जिस तरह से मोदी ने बीच में काटा था वो पत्रकारों के बीच चर्चा का विषय बन गया. केंद्र में अटल बिहारी वाजपेयी एक 20 पार्टियों वाली गठबंधन सरकार चला रहे थे. इस गठबंधन के विभिन्न घटक दल वाजपेयी पर नरेंद्र मोदी को हटाने का दबाव बना रहे थे. वाजपेयी सरकार को बाहर से समर्थन दे रही तेलुगुदेशम पार्टी अटल बिहारी वाजपेयी को दो-टूक शब्दों में जवाब दे चुकी थी. उस समय अटल सरकार में खनन मंत्री रामविलास पासवान ने गुजरात दंगों का विरोध करते हुए अपने पद से इस्तीफ़ा दे दिया था. लेकिन तब तक काफी देर हो चुकी थी. वाजपेयी कुछ दिन पहले ही अपनी कुर्सी गंवाते-गंवाते बचे थे.
11 अप्रैल 2002. चार लोग दिल्ली से गोवा के लिए उड़ान भर रहे थे. अटल बिहारी वाजपेयी, लालकृष्ण आडवाणी, जसवंत सिंह और अरुण शौरी. वाजपेयी अपना सिंगापुर दौरा खत्म करके दिल्ली लौटे ही थे. सिंगापुर जाने से पहले वो अपने विश्वस्त सिपहसालारों को निर्देश देकर गए थे कि उनके आने तक नरेंद्र मोदी का इस्तीफ़ा ले लिया जाए. हवाई जहाज में आमने-सामने बैठे अटल और आडवाणी एक दूसरे से बात करने से कतरा रहे थे. वाजपेयी ने अपने सामने पड़ा अखबार उठाया और अपने मुंह के सामने खोलकर पढ़ने लगे. जवाब में आडवाणी ने भी ऐसा ही किया. इसके बाद अरुण शौरी ने वाजपेयी के हाथ से अखबार ले लिया. आगे क्या हुआ इसका बयान हमें उल्लेख एन.पी. की किताब “The Untold Vajpayee: Politician and Paradox” में मिलता है.





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